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Chronic Kidney Disease and Diabetes: डायबिटीज और हाई बीपी कैसे बढ़ाते हैं किडनी फेलियर का खतरा? जानें बचाव के उपाय

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हेल्थ डेस्क: किडनी की बीमारियों का जोखिम तब कई गुना बढ़ जाता है, जब व्यक्ति पहले से ही डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) जैसी बीमारियों से जूझ रहा हो। कैलाश हॉस्पिटल, नोएडा के कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अनीश नंदा के अनुसार, यदि डायबिटीज और बीपी को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ना तय है। विशेषकर टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों में क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) का खतरा सबसे अधिक होता है।

🩺 क्या है क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD)?

क्रोनिक किडनी डिजीज वह स्थिति है जिसमें किडनी धीरे-धीरे अपनी कार्यक्षमता खोने लगती है। किडनी का मुख्य काम खून से गंदगी और अतिरिक्त पानी को छानकर शरीर से बाहर निकालना है। जब किडनी की सेहत बिगड़ती है, तो शरीर में विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन्स) जमा होने लगते हैं। यदि यह स्थिति गंभीर हो जाए, तो अंततः डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की नौबत आ जाती है। पैरों में सूजन और पेशाब में समस्या इसके प्रमुख शारीरिक संकेत हैं।

👨‍⚕️ विशेषज्ञों की सलाह: समय पर पहचान ही बचाव है

डॉ. अनीश नंदा चेतावनी देते हैं कि किडनी की बीमारी का स्टेज 5 में पता चलना बहुत देर हो जाने जैसा है, क्योंकि तब उपचार के विकल्प सीमित हो जाते हैं। हाई रिस्क वाले मरीजों (डायबिटीज और बीपी) को शुरुआती अवस्था में ही अपनी किडनी की सेहत की जांच करवानी चाहिए। वे कहते हैं कि अगर बीमारी को अर्ली स्टेज में पकड़ लिया जाए, तो स्थिति को बिगड़ने से रोका जा सकता है।

🧪 किडनी बचाने के लिए जरूरी टेस्ट

डायबिटीज और बीपी के मरीजों के लिए किडनी के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बहुत जरूरी है। डॉ. नंदा ने कुछ सुझाव दिए हैं:

  • यूरिन टेस्ट: पेशाब में प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) का आना किडनी की समस्या का पहला संकेत हो सकता है। इसके लिए ‘यूरिन माइक्रोएल्ब्यूमिन टेस्ट’ (Urine Microalbumin Test) नियमित अंतराल पर करवाएं।

  • नियमित ब्लड टेस्ट: मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीड़ित मरीजों को हर 6 महीने में ब्लड टेस्ट करवाना चाहिए।

  • डॉक्टरी परामर्श: यदि टेस्ट रिपोर्ट में कोई भी असामान्यता दिखे, तो बिना देरी किए किसी अनुभवी नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी विशेषज्ञ) से संपर्क करें।

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