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School Prayer Debate: संस्कार बनाम संविधान; छत्तीसगढ़ के स्कूलों में प्रार्थना को लेकर छिड़ी नई बहस

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रायपुर : छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में नए शैक्षणिक सत्र के साथ ही एक नया सियासी विवाद खड़ा हो गया है। स्कूलों में प्रतिदिन राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत के साथ ही दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, भोजन मंत्र और (sanskar vs constitution) महापुरुषों की जीवनी का वाचन अनिवार्य किए जाने के फैसले पर कांग्रेस और भाजपा के बीच ‘संस्कार बनाम संविधान’ की जंग शुरू हो गई है।

 राष्ट्रभक्ति और चरित्र निर्माण

भाजपा सरकार और पार्टी नेताओं का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी ज्ञान देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना का संचार करना भी है। सांसद संतोष पाण्डेय के अनुसार, महापुरुषों की जीवनी का वाचन बच्चों को इतिहास के आदर्शों से परिचित कराएगा, जिससे उनमें राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित होगी।

 कांग्रेस का विरोध 

दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस निर्णय को शिक्षा के ‘भगवाकरण’ की दिशा में कदम बताते हुए कड़ा विरोध जताया है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 28(1) और 28(3) का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी संस्थानों में किसी विशिष्ट धार्मिक परंपरा या मंत्रों का पाठ थोपना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। कांग्रेस का तर्क है कि यदि सनातन परंपरा लागू होती है, तो अन्य धर्मों के विद्यार्थी भी अपनी धार्मिक परंपराओं की मांग करेंगे, जिससे शिक्षा का माहौल प्रभावित होगा।

 क्या है प्रार्थना में नया?

नए आदेश के तहत अब स्कूलों की सुबह की प्रार्थना सभा में केवल राष्ट्रगान ही नहीं, बल्कि एक निर्धारित सूची के अनुसार मंत्रों का पाठ और महापुरुषों के प्रेरणादायी संस्मरण भी शामिल होंगे। यह पहल राज्य (sanskar vs constitution) सरकार द्वारा विद्यार्थियों में अनुशासन और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू की गई है।

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